नवसंवत्सर

सम्वत्सर २०८३

ओऽम् स्वस्ति श्री गणेशाय नमः।। ओऽम् अचिन्त्याव्यक्तरुपाय निर्गुणाय गुणात्मने। समस्त जगदाधार मूर्तये ब्रह्मणे नमः।। तिथिर्वारश्च नक्षत्रं योगः करणमेव च पञ्चाङ्गस्य फलं श्रुत्वा गङ्गास्नानफलं लभेत्।।

नव संवत्सर रौद्र व विक्रमी संवत् २०८३ के ग्रहपरिषद् का वार्षिक फलादेश

अथास्मिन् वर्षे सृष्टितो गताब्दाः 19558ला85127 वर्तमानो वैवस्वतमनुः तस्य प्रवृत्तेः सप्तविंशतिमितानि महायुगानि व्यतीतानि, अष्टविंशतितमे युगे त्रयो युगचरणाः गताः। अत्र कृतयुग प्रमाणं- 17ला18000 वर्ष, त्रेतायुग प्रमाणं- 12ला96000 वर्ष, द्वापरयुग प्रमाणं- 8ला64000 वर्ष, कलियुग प्रमाणं 4ला32000 तन्मध्ये कलिः प्रथम चरणे संवत् 5127 अथास्मिन् शुभ सम्वत्सरे श्रीमन्नृपति वीरविक्रमादित्य राज्यतो गताब्दाः 2083, श्रीकृष्ण जन्म संवत् 5262, शक संवत् 1948, आङ्गल-वर्षानुसारेण 2026-2027 ईस्वी तत्र बार्हस्पत्यमानेन प्रभवादिषष्ठि सम्वत्सराणां मध्ये चतुपञ्चाशत्तमं (५४वाँ) “रौद्र” नाम शुभ सम्वत्सरः प्रवर्तते॥ 

संसार की उत्पत्ति के साथ ही परिवर्तन जुड़ा हुआ है। सृष्टि के रचियता ने भी समय-समय पर विष्णुजी द्वारा सृष्टि की रचना का आदेश ब्रह्माजी को दिया और उन्होंने सृष्टि की रचना की। समय के साथ युग परिवर्तन हुआ। कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग आया एवं राजा परीक्षित की शरण में याचक बनकर कलियुग ने प्रवेश किया। युग व्यवस्थानुसार सत्ययुग में मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, त्रेतायुग में वामन, परशुराम, श्रीरामचन्द्र, द्वापरयुग में श्रीकृष्ण और कलियुग में बुद्ध अवतार हुये तथा जब कलियुग के ८२१ वर्ष व्यतीत होने को रहेंगे, तो शंभल नामक ग्राम में विष्णुयश शर्मा के घर में भगवान् विष्णु श्रीकल्कि रूप में अवतार लेंगे। सत्ययुग में पुष्कर प्रधान-तीर्थ था। त्रेतायुग में नैमिषारण्य, द्वापरयुग में कुरुक्षेत्र और कलियुग में गङ्गा (हरिद्वार) प्रधान-तीर्थ है। सत्ययुग में धर्म चार पैर बाला था। त्रेतायुग में तीन पैर बाला, द्वापरयुग में दो पैर बाला तथा कलियुग में एक पैर बाला धर्म है, अर्थात् कलियुग में २५ भाग ही धर्म और ७५ भाग पाप है। सत्ययुग में इच्छित वर्षा होती थी इसलिए अन्न एक बार बीजकर २१ बार काटते थे। त्रेतायुग में भी वर्षा ठीक समय पर होती थी इसलिए फसल एक बार बीजकर ७ बार काटते थे तथा द्वापरयुग में फसल एक बार बीजकर ३ बार काटते थे। परन्तु कलियुग में वर्षा असमय होने से फसल एक बार बीजकर १ बार ही काटेंगेे, वह भी निश्चित नहीं नष्ट भी हो सकती है। वर्ण व्यवस्था अनुसार तीनों युगों में चारों वर्ण अपने-अपने वर्णाश्रम धर्म पर अटल थे। परन्तु कलियुग में अधिकतर ब्राह्मणवर्ग वेदज्ञान से शून्य क्षत्रिय लोग अधर्मी, वैश्य ठग व लूटेरे और शूद्र उच्चवर्ग से घृणा रखेंगे। इसके अतिरिक्त कलियुग में वर्णसंकत्व बहुत होगा। धूर्तों की पूजा होगी। व्यभिचारिणी साधवी और पाखण्डी संत कहलायेंगे। पुरुष स्त्रियों के वश में होंगे। पिता कन्या का विक्रय करेगा। जब पूर्णत्यः पूरे विश्व की सता पर अशिक्षित सतासीन होंगे तो यह कलियुग का अन्त समझें।

अथ कलिरुपम् :- पिशाचवदनः क्रूरः कलिश्च कलहप्रियः, धृत्वा वामे करे शिश्नं दक्षे जिह्वाञ्च नृत्यति।

विक्रमी संवत् 2083 का शुभारम्भ बार्हस्पत्यमानेन के अन्तर्गत चौवलीसवां “रौद्र” नामक सम्वत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तदनुसार चैत्र प्रविष्टे 6, गुरुवार 19 मार्च सन् 2026 ई॰ को प्रारम्भ हो रहा है।। (19 मार्च, गुरुवार को 6 बजकर 54 मि॰ पर उ॰भा॰ नक्षत्र, मीनस्थ चन्द्रमां के मीन लग्न में।)

“रौद्र” नवसम्वत्सर का फल विभिन्न संहिताओं में इस प्रकार लिखा है:-

बशिष्ठसंहिता के अनुसार : -

युद्ध्यन्ति क्षितिपतयः परस्परं हन्तुमुद्यताः सर्वे। 
कोंकणदेशक्षितिपतिनिधनं तत्रैव रौद्राब्दे ॥
रौद्र संवत्सर में राजाओं में परस्पर युद्ध तथा एक दूसरे को मारने के लिए उद्यत रहें। और कोंकण देश के राजा की मृत्यु हो।

नारद संहिता के अनुसार :-

अन्योऽन्यं नृपसंक्षोभं चौरव्याघ्रादिभिर्भयम् । 
मध्यवृष्टिरनर्घत्वं रौद्राब्दे नैव गुर्जरे ॥
रौद्र नामक सम्वत्सर में राजनैतिक तनाव बढ़ता है, चोर, डाकू तथा आतङ्कियों का भय उत्पन्न होता है। वर्षा सम होती है तथा महँगाई बढ़ती है, परन्तु गुजरात में शान्ति एवं सुख-चैन रहता है॥

वर्ष प्रबोध के अनुसार :-

रौद्रेब्दे नृपसंभूतक्षोभक्लेशसमन्विते । 
सततंत्वखिलालोकामध्यसस्यार्घवृष्टयः ।।
रौद्र वर्ष में राजाओं में क्षोभ हो तथा क्लेशसंयुक्त हो और अन्न जल मध्यम हो ॥

मेघमाला के अनुसार :-

अल्पतोयप्रदा मेघा अल्पशस्या च मेदिनी। 
निष्ठुराः पार्थिवाः सर्वे देवि रौद्रं प्रजायते ।।
मेघ अल्प वर्षा करते हैं, पृथ्वी पर कृषि उपज अल्प होती है, सभी पार्थिव (पृथ्वीवासी) निष्ठुर अथवा निष्क्रिय रहते हैं॥

संवत्सर संहिता के अनुसार :-

अल्पतोयप्रदा मेघा अल्पसस्या च मेदिनी । 
निष्ठुराः पार्थिवा लोके दावो रौद्रे प्रजायते ॥
रौद्र संवत्सर में कम वर्षा, फलस्वरूप कृषि उपज की कमी होती है। राजा लोग निर्दय होकर जनविरोधी बातें करते हैं। जंगलों या खलिहानों में आग से हानि होती है॥

बृहत्संहिता के अनुसार :-

रौद्रोऽतिरौद्रः क्षयकृत् प्रदिष्टो यो॥

रौद्र संज्ञक सम्वत्सर में बहुत-सी अशुभता उत्पन्न होती है तथा जनगणों का नाश होता है॥

भविष्यफल भास्कर के अनुसार :-

रौद्रेब्दे नृपसंभूतक्षोभक्लेशसमन्विताः ।
सततं त्वखिला लोका मध्यसस्यार्घवृष्टयः॥
रौद्रवर्षमें राजाओंसे उत्पन्न क्षोभ और क्लेशसे सब प्राणियोंको क्लेश हो और वर्षा तथा धान्य कम हो॥

मेघ महोदय के अनुसार ही संवत्सर के स्वामी का फल :-

रौद्रे चन्द्रः स्वामी, पृथिवी रोगबहुला, चतुष्पद‌नाशः, छत्रभङ्गोऽल्पमेघश्चैत्रादिमासत्रये महर्घता, आषाढे़ श्रावणेऽल्पमेघः, खण्डवृष्टिः, भाद्रपदे महान् मेघोऽन्नसमर्घता, अन्यव्वस्तुमञ्जिष्ठा सौपारिकालविंग समर्घता लोकसुखी, चतुष्पदसमर्घता हस्तिपीड़ा ॥

रौद्र वर्ष का स्वामी चन्द्र है, अतः पृथ्वी में रोग अधिक, पशु का विनाश, छत्रभंग, थोड़ी वर्षा, चैत्रादि तीन मास तेजी, आषाढ़ श्रावण में थोड़ी वर्षा, खण्ड वृष्टि भादों में अधिक वर्षा, अनाज भाव सस्ता, दूसरी बस्तु मंजीठ सोपारी लौंग आदि सस्ता लोक सुखी, पशु सस्ते और हाथियों को पीड़ा ॥

निष्कर्ष यही है कि रौद्र संवत्सर में कहीं अधिक वर्षा तो कहीं वर्षा की कमी रहे या कुछ प्रान्तों में दुर्भिक्ष से कृषिकर्म बाधित रहें एवं शासक वर्ग मनमानी करेंगे, जन-विरोधी वातावरण बने। अनेकत्र स्थानों, शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों में अग्निकाण्ड,यान-दुर्घटना से जनधन हानि के योग बन रहे हैं। राजनैतिक क्षेत्र में परस्पर क्लेश रहेगा। नानाविध रोगों से जन-जीवन त्रस्त रहे, किसी विशिष्ट व्यक्ति के निधन से शोक व्याप्त हो। चैत्रादि तीन मासों में  महंगाई बढ़े। आषाढ़ श्रावण में वर्षा की कमी रहे। भाद्रपद में भयंकर वर्षा, तो कुछ प्रान्तों में अकाल की स्थिति बने। भारत के पड़ौसी देश-विशेषों में कहीं युद्धाग्नि  किंवा जातीय संघर्ष का वातावरण बने।

॥ अथ दशाधिकारिणः।।

अस्मिन् वर्षे राजा गुरुः । मंत्री मङ्गलः । सस्येशो गुरुः। धान्येशः चन्द्रः । मेघेशो चन्द्रः । रसेशो शनिः । नीरसेशो गुरुः । फलेशो चन्द्रः । धनेशो गुरुः । दुर्गेशो चन्द्रः।।

संवत २०८३ के राजा बृहस्पति हैं। मंत्रिपद मंगल को प्राप्त है। ग्रीष्मकालीन फसलों के स्वामी बृहस्पति हैं। शीतकालीन फसलों के स्वामी बुध हैं। वर्षा के स्वामी चंद्रमा हैं। रस्स अर्थात तरल पदार्थ के स्वामी शनि हैं। धातु और व्यापार का पद बृहस्पति को प्राप्त है। फल-फूल के स्वामी चंद्रमा हैं। कोषाध्यक्ष बृहस्पति हैं और सेनापति चंद्रमा हैं॥

॥ अथ अधिकारिणाम् फलम् ॥

इस वर्ष के राजा– गुरु हैं -

गुरौ नृपे वर्षति कामदं जलं महीतले कामदुघाश्वधेनवः । 

यजन्तिविप्रा बहवोऽग्निहोत्रिणो महोत्सवः सर्वजनेषु वर्तते॥

यदि संवत् का राजा बृहस्पति राजा हो तो उपयोगी जल वर्षे, गायें अच्छा दूध दें, ब्राह्मण लोग होम यज्ञादि में निरत रहें और सब लोगों में बड़े बड़े उत्सव होते रहें॥

लेकिन इस वर्ष के मन्त्री मंगल हैं, तो : –

अवनिजे ननु मंत्रिपदं गते भवति दस्यु-गदादिज वेदना । 

जनपदेषु जयं सुख-संचयं न बहु गोषु पयो द्विजकर्म च

मन्त्रीपद मंगल को प्राप्त होने से अनेक प्रकार के मारक रोगों से जनता परेशान रहे। चोर-उचक्कों का प्रभाव अधिक रहे एवं युद्धार्थ मारक शस्त्रों का प्रभाव भी अधिक रहे। कुछ क्षेत्रों में भूकम्प, समुद्री तूफान आदि प्राकृतिक प्रकोप से हानि के योग भी बन रहे हैं ॥

  • सस्येश (ग्रीष्मकालीन फसलों के स्वामी) गुरु हैं - पर्याप्त वर्षा, पैदाबार अच्छी हो। 
  • धान्येश (शीतकालीन फसलों के स्वामी) बुध हैं - कृषि उपज अच्छी हो। पर्याप्त मात्रा में वर्षा हो।
  • मेघेश (वर्षा के स्वामी) चंद्रमा हैं - बहुत वर्षा हो सुख शांति रहे। 
  • रसेश (रस्सों के स्वामी) शनि हैं - भूगर्भगत जलस्तर की कमी हो। 
  • नीरेश (धातुओं व व्यापार के स्वामी) गुरु हैं - रंगीन पहरावा और स्वर्ण धातु में तेजी रहे।
  • फलेश (फलों के स्वामी) चंद्रमा हैं - फल-फूल र्याप्त मात्रा में हो।
  • धनेश (धन-दौलत के स्वामी) गुरु हैं -व्यापारियों के लिये अनुकूल वातावरण रहे।
  • दुर्गेश (सेनापति के स्वामी ) चंद्रमा हैं - प्रतिष्ठित लोगों का मानसमान बना रहे ।

इस वर्ष रोहिणी का वास समुन्द्र में है "समुद्रे तु महावृष्टिः"। अतः समुद्रतटवर्ती क्षेत्रों में समुद्री तूफान का भय रहे। समय का वास माली के घर में है। अतः पर्वतीय क्षेत्रों में अच्छी वर्षा हो। समय का वाहन चातक है। अतः महंगाई से जनता परेशान रहे।

नोट :- उपरोक्त दस पदाधिकारियों का फलादेश जो लिखा गया है उनमें अधिकतर शुभ ग्रह हैं और उन ग्रहों का फल अनुकूल ही है। परंतु यह गौण है विशेष प्रभाव वर्ष में होने वाले ग्रहों का संचार तथा संवत्सर का फल विशेष रहता है। अनुभव में भी यही आया है।

नवमेघों में कीलक एवं चतुर्मेघों में पुष्कर नामक मेघ है। सप्तवायु में संवह नामक वायु है। अष्टक नागों में सुतक्षक और द्वादश नागों में तक्षक नामक नाग है। “मन्दवृष्टिः स्यात्।" अतः वर्षा मध्यम हो, वायु वेग, प्राकृतिक आपदा और जलवायु प्रदूषण आदि समस्याएं रहेगी।

जलस्तम्भ (३.६४%) लगभग नगण्य है। तृणस्तम्भ (२१.४३%) क्षीण है। वायुस्तभ (५३.३४%) प्रबल और अन्नस्तम्भ (४३.३३%) प्रबल है। अतः पेयजल संकट, कृषि उपज को हानि, वनस्पति व पशु चारा पर्याप्त मात्रा में न मिले। परंतु वायु व अन्न स्तंभ दृढ़ होने से वायु वेग से हानि हो परंतु  खाद्यान्न पर्याप्त हो ॥

वर्षा आदि के विश्वमान :-> वर्षाविश्वा-17, धान्य-11, तृण-5, शीत-13, तेज-17, वायु-13, वृद्धि-15, क्षय-15, विग्रह-11, क्षुधा-5, तृषा-3, निद्रा-9, आलस्य-9, उद्यम-7, शान्ति-9,  क्रोध-7, दम्भ-13, लोभ-3, मैथुन-15, रस-9, फल-13, उत्साह-11, उग्रता-11, पाप-13, पुण्य-3, व्याधि-3, व्याधिनाश-1, आचार-1, अनाचार-7, मृत्यु-5, जन्म-15,  देशोपद्रव-5, देशस्वास्थ्य-11, चौर -1, चौरनाश-11, अग्नि-9, अग्निशान्ति-13, उद्भिज्ज-9, जरायुज-3, अण्डज-11, स्वेदज-5, टिड्डी-5, तोता-9, मूषक-7, सोना-11, ताँबा-17, स्वचक्र-5, परचक्र-11, वृष्टि-17, वृष्टिनाश-11, सम्वत् विश्वा-18, तिथिक्षय-18, तिथिवृद्धि -11 व सम्वत् दिनानि-383

सम्वत् २०८३ में ग्रहों का गोचर फल ¹

(¹ नोट:– गोचर का शुभाशुभ विशेष फल अपनी–अपनी जन्म कुण्डली के अनुसार प्रभावित होगा।)

मेष राशि

वर्षारम्भ से वर्षान्त तक इस राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा।  इससे मानसिक तनाव, गुप्त चिन्ताएं तथा धन सम्बन्धी समस्याएं रहेंगी। व्यर्थ शत्रु तथा रोग उत्पन्न होने का भय रहेगा। विंशोतरी मतानुसार व्यापार, सट्टा आदि द्वारा अकस्मात् धन लाभ हो। जमीन-जायदाद आदि कार्यों में खर्चा हो। आय के साधनों में वृद्धि हो। गुरु मेष राशि के लिए अधिक शुभ नहीं है, परंतु राहू का प्रभाव शुभ रहेगा। अतः मेष राशि बालों के लिए यह वर्ष मिलाजुला ही रहेगा । मंगल द्वादश (व्यय) भाव में शनियुक्त होकर संचार करने से व्यर्थ यात्रा, खर्च के कारण तनाव रहे, फिजूलखर्ची से बचें।

वृष राशि

वर्षभर वृष राशि पर शनि की तृतीय परन्तु मित्र दृष्टि रहने से मिश्रित प्रभाव रहेंगे। कार्य-व्यवसाय में संघर्ष अधिक होगा। कार्यों में विघ्न/बाधाओं के पश्चात् सफलता मिलेगी। शुक्र नीचराशि में होने से किसी दुष्ट व्यक्ति द्वारा हानि होने के संकेत मिलते हैं। आय के साधनों में भी विघ्न उत्पन्न होंगे। विंशोतरी मतानुसार धन लाभ मध्यम रहेगा, परन्तु शुभ कार्यों में खर्च होगा। राहू और गुरु का प्रभाव भी अधिक अनुकूल नहीं रहेगा। 

मिथुन राशि

वर्षारम्भ से 1 जून तक गुरु इस राशि पर संचार करने से मानसिक तनाव एवं घरेलु उलझनें अधिक रहेंगी। यद्यपि विद्यार्थियों को विद्या में सफलता बनेंगी । सन्तान, पति/पत्नी के भाग्य में वृद्धि होगी। 3 फरवरी से 10 अप्रैल तक राशिस्वामी बुध भाग्यस्थान में राहुयुक्त होकर संचार करने से लाभ व उन्नति के मार्गों में विघ्न-बाधाएँ रहेंगी। बुध का प्रभाव लगभग शुभ ही रहेगा। व्यापार/नौकरी में लाभ, नई-नई योजनाएँ बनेंगी, मकान बनाने या कुछ परिवर्तन करने की योजना भी बनेगी। अचानक धन, वाहन, घर, सुख-सुविधाएं और यात्रा में वृद्धि होगी। उच्च प्रतिष्ठा वाले लोगों से संपर्क स्थापित हो। विंशोतरी मतानुसार लाभ कम तो फिजूलखर्ची अधिक होगी। बनते कार्यों में विघ्न पड़ेगा। गुरु का प्रभाव तो अनुकूल है। परंतु राहू आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित करेगा। शनि के प्रभाव से राजकीय कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। 

कर्क राशि

वर्षारम्भ से 5 दिसम्बर तक राहु अष्टम भाव में संचार करने से स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। पेट, वायु (गैस) सम्बन्धी रोगों का भय है। व्यर्थ के वाद-विवाद एवं तनाव अधिक रहेगा। कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी रह सकती है। निकट भाई बन्धुओं से मनमुटाव हो सकता है। गुरु और राहू का प्रभाव प्रतिकूल ही रहने संभावना है। विंशोतरी मतानुसार मानसिक तनाव, शरीर कष्ट और रोगादि पर खर्च हो। आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हों।

सिंह राशि

सिंह राशि पर शनि की ढैय्या का प्रभाव वर्षपर्यन्त रहेगा। स्वास्थ्य हानि, सिर-पीड़ा, पेट एवं हृदय सम्बन्धी रोग, बनते कार्यों में अड़चनें रहेंगी। 14 अप्रैल से सूर्य भाग्यस्थान में उच्चस्थ होने से आय के स्रोतों में वृद्धि तथा धन लाभ के आ बनेंगे। जून-जुलाई में सूर्य-शनि में दृष्टि सम्बन्ध होने से आय कम व खर्च बढ़ेंगे। गुरु और राहू का प्रभाव सामान्य से कम ही अनुकूल रहने की संभावना है। विंशोतरी मतानुसार मानसिक तनाव, शरीर कष्ट और रोगादि पर खर्च हो। आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हों।

कन्या राशि

वर्षभर शनि की दृष्टि इस राशि पर रहने के प्रभावस्वरूप शरीर-कष्ट, गृह में कलह-क्लेश, आर्थिक परेशानियां, आय कम व खर्चों की अधिकता होने की सम्भावनाएँ होंगी। 23 फरवरी से 11 मई तक मंगल की भी विशेष दृष्टि रहेगी जिससे मानसिक तनाव, उलझनें, वृथा खर्च बढ़ेंगे। दिसम्बर से समयावधि अनुकूल एवं लाभ देने वाली होगी। गुरु और राहू का प्रभाव अनुकूल रहेगा। सुख और प्रगति देने वाला है। विंशोतरी मतानुसार लाभ कम तो फिजूलखर्ची अधिक होगी। बनते कार्यों में विघ्न पड़ेगा। 

तुला राशि

वर्षारम्भ से 1 जून तक गुरु की विशेष शत्रु पंचम दृष्टि रहने से नित्य नई घरेलु एवं व्यवसायिक परेशानियां व समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। परन्तु सत्संग एवं सम्यक विचारशीलता से सभी का निराकरण भी होता जाएगा। 25 मार्च से 19 अप्रैल तक शुक्र की स्वगृही दृष्टि रहने से मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि, अकस्मात् धन-लाभ व उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे। परन्तु 14 अप्रैल से 14 मई के मध्य इस राशि पर सूर्य की नीच दृष्टि रहने से प्रतिकूल प्रभाव रहेगा। शुक्र स्वराशिगत तुला में संचार करने से वर्षान्त तक मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि, अकस्मात् धन-लाभ व उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे। गुरु और राहू का प्रभाव सामान्य से कम ही अनुकूल रहेगा। विंशोतरी मतानुसार धन लाभ मध्यम रहेगा, परन्तु शुभ कार्यों में खर्च होगा। राहू और गुरु का प्रभाव भी अधिक अनुकूल नहीं रहेगा। 

वृश्चिक राशि

शुभ धार्मिक कार्यों की ओर प्रवृत्ति, सन्तान सुख तथा घर में कोई शुभ कार्य भी होगा। 2 अगस्त से 18 सितंबर के मध्य मंगल अष्टमस्थ संचार करने से स्वास्थ्य सम्बन्धी विशेष सावधानी रखें । इसके बाद 12 नवंबर तक मंगल नीचराशिगत संचार करने से मानसिक तनाव, घरेलु उलझनें एवं व्यवसाय में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। विंशोतरी मतानुसार व्यापार, सट्टा आदि द्वारा अकस्मात् धन लाभ हो। जमीन-जायदाद आदि कार्यों में खर्चा हो। आय के साधनों में वृद्धि हो। गुरु तो सामान्य अनुकूल रहेगा। परंतु राहू नवंबर तक प्रतिकूल दिखाई दे रहा है। पर, उसके बाद राहू भी अनुकूल फल देगा। 

धनु राशि

इस राशि पर शनि की ढैय्या का प्रभाव वर्षभर रहेगा। 1 जून से 31 अक्तूबर तक राशिस्वामी गुरु उच्चराशिगत 1 होने पर भी अष्टमस्थ होगा। अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियों भरा वातावरण रहेगा।31 अक्तूबर से गुरु सिंह राशि एवं भाग्यस्थान में प्रविष्ट होकर लग्न एवं पंचम भाव को देखेगा। गुरु सिंह राशि में वर्षान्त तक रहेगा। इस अवधि में धार्मिक कार्यों की ओर रुचि बनेगी। निर्वाह योग्य आय के साधन बनते रहेंगे। परन्तु शनि की ढैय्या के कारण मानसिक तनाव एवं खर्च भी बढ़ेंगे। विंशोतरी मतानुसार धन लाभ मध्यम रहेगा, परन्तु शुभ कार्यों में खर्च होगा।

मकर राशि 

वर्षभर राशिस्वामी शनि तृतीय भाव में संचार करेगा। सन्तान सम्बन्धी विशेष चिन्ता रहे तथा खर्च भी बढ़-चढ़ कर होते रहेंगे। 1 जून से 31 अक्तूबर तक गुरु की नीच दृष्टि रहेगी। शुभाशुभमिश्रित फल प्राप्त होंगे। व्यर्थ की चिन्ताएँ रहेंगी। 18 सितंबर से 12 नवंबर तक इस राशि पर मंगल की उच्च दृष्टि रहेगी, जिससे मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि तथा बिगड़े कार्यों में सुधार होगा। परन्तु धन स्थान पर राहु की स्थिति होने से आकस्मिक खर्च भी बढ़ेंगे। 31 अक्तूबर से वर्षान्त तक गुरु अष्टम सिंह राशि में संचार करेगा। अत्यन्त कठिन परिस्थितियों का सामना रहेगा और राहु भी मानसिक तथा घरेलु वातावरण में उथल-पुथल कर सकता है। विंशोतरी मतानुसार व्यापार, सट्टा आदि द्वारा अकस्मात् धन लाभ हो। जमीन-जायदाद आदि कार्यों में खर्चा हो। आय के साधनों में वृद्धि हो।

कुम्भ राशि

शनि द्वितीय संचार करने से शनि साढ़ेसाती का प्रभाव है। 5 दिसम्बर तक इस राशि पर राहु का संचार रहेगा। परंतु 1 जून तक गुरु की इस राशि पर दृष्टि रहने से वर्ष का पूर्वार्द्ध अपेक्षाकृत शुभ एवं लाभदायक रहेगा। भाग्य में धन लाभ के अवसर प्राप्त होंगे। 17 अगस्त से 16 सितंबर के मध्य इस राशि पर सूर्य की दृष्टि रहने से इस अवधि में कार्य-व्यवसाय सम्बन्धी विशेष परेशानियां होगी। 31 अक्तूबर से वर्षान्त तक गुरु की विशेष सप्तम दृष्टि इस राशि पर रहने से किसी प्रियवन्धुसन्त महात्मा के दर्शन होंगे, तीर्थयात्रा हो अथवा परिवार में कोई मंगल कार्य आयोजन होगा। 5 दिसंबर से राहु का संचार भी हट जाने से कुछ बेहतर हालात बनेंगे। विंशोतरी मतानुसार व्यापार, सट्टा आदि द्वारा अकस्मात् धन लाभ हो। जमीन-जायदाद आदि कार्यों में खर्चा हो। आय के साधनों में वृद्धि हो।

मीन राशि

वर्षभर शनि लग्नस्थ संचार करने से सम्पूर्ण वर्ष 'शनि-साढ़ेसाती' का प्रभाव रहेगा। वर्षारम्भ से राशिस्वामी गुरु चतुर्थ भाव में मिथुन राशिगत होकर 1 जून तक संचार करने से इस अवधि में मिश्रित फल घटित होंगे। 1 जून से 31 अक्तूबर तक राशिस्वामी गुरु उच्चस्थ होकर पंचम भाव में रहेगा। जिससे उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ सम्पर्क रहेंगे। धार्मिक कार्यों में रूचि बढ़ेगी। 18 सितंबर से 12 नवंबर तक भाग्येश मंगल नीच राशि होने से अकस्मात् खर्च बढ़ेंगे तथा सेहत में विकार एवं घरेलु झंझटों के कारण मानसिक तनाव होंगे। 31 अक्तूबर से 5 दिसंबर तक गुरु षष्ठस्थ केतु युक्त रहने से कार्यों में विलम्ब उत्पन्न हो। विंशोतरी मतानुसार धन लाभ मध्यम रहेगा, परन्तु शुभ कार्यों में खर्च होगा।

ग्रहण विवरण- इस वर्ष कोई भी ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा । 

त्योहार का संक्षिप्त परिचय :- रामनवमी-27 मार्च 2026, अक्षयतृतीया-19 अप्रैल 2026, रक्षाबंधन-28 अगस्त 2026, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी-4 सितम्बर 2026, शरद् नवरात्र प्रारम्भ-11 अक्टूबर  2026 से हैं, विजयादशमी-21 अक्तूबर 2026 को, दीपावली-9 नवंबर 2026, भाईदूज-11 नवम्बर 2026, शिवरात्रि-06 मार्च 2027 और होली-22 मार्च 2027 को है।

फलानि ग्रहसंचारेण सूचियन्ति मनीषिणः।

को वक्तः तारतम्यस्य वेधसं विना।।

अर्थात् समर्थ भविष्य के निर्धारक तो स्वयं ईश्वर ही हैं।।

संवत्सर का श्रवणफल-संवत्सर का श्रवण करना चाहिए। इसके बाद काली मिर्च, नीम की पत्ती, मिश्री, अजवाइन व जीरा का चूर्ण बनाकर खाना चाहिए।

।। “इतीदं वत्सरफलं वत्सरादि तिथौ शुभम् । यः शृणोति नरो भक्त्या स सुखी वत्सरं भवेत् ”।।